सीमावर्ती गांवों में तार की बाड़ के लिए भूमि दाताओं के लिए कानूनी दस्तावेज बनाने का प्रयास किया जा रहा है

जलपाईगुड़ी जिले के बेरुबारी के कुछ हिस्सों को 1952 से विवादित भूमि बताया जाता रहा है। हाल ही में राज्य सरकार ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के लिए स्थानीय लोगों से जमीन उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है। देश की सुरक्षा के हित में कई स्थानीय लोगों ने पहले ही जमीन उपलब्ध कराने पर सहमति जताई है। लेकिन, नेहरू-नून समझौते और भारत का नक्शा बनाने वाले रेडक्लिफ मानचित्र ने इसमें रोड़ा अटका दिया है। बुधवार को भारत-बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के काम को आगे बढ़ाने के लिए बीएसएफ, सदर विधानसभा के विधायक पीके वर्मा और स्थानीय लोगों के प्रतिनिधियों ने जिलाधिकारी कार्यालय में अहम बैठक की।

इस संदर्भ में सदर विधानसभा विधायक पीके वर्मा ने कहा कि अतिक्रमण हटाने का काम जारी है, स्थानीय लोग भी कंटीले  तार की बाड़ के लिए जमीन देना चाहते हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि जमीन मालिक के पास फिलहाल उन जमीनों के वैधानिक दस्तावेज नहीं हैं, हमने उन जमीनों के वैधानिक दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।आपको बता दें कि नेहरू-नून समझौता 1958 में भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधान मंत्री फिरोज खान नून के बीच हुआ एक सीमा समझौता था। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा विवादों को सुलझाना था, खासकर पश्चिम बंगाल के बेरुबारी क्षेत्र को लेकर।

समझौते के मुख्य बिंदु: समझौते के अनुसार, बेरुबारी यूनियन नंबर 12 को भारत और पाकिस्तान के बीच बराबर-बराबर बांटा जाना था। इस समझौते में भारत और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के बीच अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों के आदान-प्रदान का भी प्रावधान था। नेहरू-नून समझौते को लागू करने के लिए, 1960 में भारत के संविधान में 9वां संशोधन किया गया था। लेकिन समस्याएं अभी भी बरक़रार है।

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