भारतीय रुपया शुक्रवार, २३ (तेईस) जनवरी को विदेशी बाजारों में भारी उथल-पुथल के कारण अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ९२ (बानवे) के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया। इस ऐतिहासिक गिरावट का मुख्य कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) द्वारा भारतीय शेयर बाजार से बड़े पैमाने पर की जा रही निकासी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में वृद्धि और वैश्विक स्तर पर सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की बढ़ती मांग ने भारतीय मुद्रा पर अत्यधिक दबाव डाला, जिससे इंट्रा-डे कारोबार के दौरान इसमें काफी गिरावट दर्ज की गई।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच लंबित व्यापार समझौते की अनिश्चितता और घरेलू शेयर बाजारों में कमजोरी ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। हालाँकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा बाजार की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए डॉलर की बिक्री के माध्यम से हस्तक्षेप करने की संभावना जताई गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता सफल रहती है और विदेशी निवेश में सुधार होता है, तो २०२६ (दो हजार छब्बीस) के आगामी महीनों में रुपये में रिकवरी देखी जा सकती है। फिलहाल, आयातकों की डॉलर की मांग और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितता रुपये के लिए बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
