भारत में अग्नाशय कैंसर का संकट: 3% जीवित रहने की दर शीघ्र पहचान की आवश्यकता को उजागर करती है

पैनक्रियाटिक कैंसर सबसे खतरनाक और तेजी से फैलने वाले कैंसर में से एक है, और भारत में बढ़ती चिंता का विषय बनता जा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि यह कैंसर अक्सर बहुत देर से पता चलता है और पिछले कई वर्षों में इसके इलाज में ज्यादा प्रगति नहीं हुई है। डॉ. पी.एन. मोहापात्रा, डायरेक्टर मेडिकल ऑन्कोलॉजी, अपोलो हॉस्पिटल्स ने बताया कि पैनक्रियाटिक कैंसर में मरीज़ का पांच साल जीवित रहने का दर केवल 3 प्रतिशत है, जो सभी कैंसर में सबसे कम है। जहां ब्रेस्ट और लंग कैंसर जैसे कैंसर में जल्दी पता लगाने, अधिक जागरूकता और इलाज के बेहतर विकल्प होने के कारण अच्छे परिणाम देखने को मिलते हैं, लेकिन पैनक्रियाटिक कैंसर पर उतना ध्यान नहीं दिया गया है। कई सालों से इस कैंसर के लिए कोई नया बड़ा इलाज नहीं आया है। ज्यादातर मरीजों को आमतौर पर पारंपरिक कीमोथेरेपी दी जाती है, जिससे बहुत कम फ़ायदा होता है।

भारत में लगभग 43% मरीजों में यह कैंसर सीधे स्टेज 4 में पाया जाता है, तब कैंसर फैल चुका होता है और इसका इलाज करना बहुत मुश्किल हो जाता है। जिन मरीज़ों की सर्जरी और कीमोथेरेपी होती है, उनमें भी कैंसर वापस आने की संभावना ज़्यादा होती है और उनके जीवित रहने का दर केवल 12–15 % के आसपास रहती है। डॉ. मोहापात्रा ने कहा, “पैनक्रियाटिक कैंसर अभी भी लोगों को ठीक से समझ में नहीं आया है और इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। इसे अक्सर ‘नेग्लेक्टेड कैंसर’ कहा जाता है क्योंकि जागरूकता, रिसर्च और सरकारी मदद की कमी इसकी बढ़ती संख्या के अनुसार नहीं हैं।” उन्होंने बताया कि ज़्यादातर लोगों को इसके शुरुआती लक्षणों के बारे में पता नहीं होता। जैसे लगातार पेट या पीठ में दर्द, अचानक वजन कम होना, पीलिया, भूख न लगना, पाचन की समस्या या अचानक डायबिटीज़ होना – इन लक्षणों को लोग अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। ज्यादातर मरीज हमारे पास तब आते हैं जब कैंसर पहले ही शरीर में फैल चुका होता है, और उस समय उनके जीवित रहने की संभावना केवल 3% होती है।” देर से पता लगने का एक बड़ा कारण यह है कि अग्नाशय शरीर के अंदर गहराई में होता है, जिससे साधारण जांच से इसे देख पाना मुश्किल होता है। इसके अलावा, यह कैंसर जटिल तरीके से बढ़ता है, जिससे दवाएं ठीक से काम नहीं कर पाती। इन चुनौतियों और सीमित इलाज के विकल्पों के कारण इस बीमारी में मृत्यु दर बहुत अधिक दिखाई देती है।

डॉ. मोहापात्रा ने कहा कि पैनक्रियाटिक कैंसर के लिए सरकार, रिसर्च संस्थान, हॉस्पिटल और फंडिंग एजेंसियों को तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। “हमें सरकार, डॉक्टर, रिसर्चर्स और मरीज समूहों के बीच मजबूत सहयोग की जरूरत है। रिसर्च में ज़्यादा निवेश, ज्यादा क्लिनिकल ट्रायल और जल्दी पता लगाने के बेहतर तरीके इस कैंसर के भविष्य को बदल सकते हैं। साथ ही, हमें लोगों में जागरूकता बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है ताकि लोग समय पर लक्षणों को पहचान सकें और समय पर मेडिकल मदद ले सकें।” पैनक्रियाटिक कैंसर को अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सही ध्यान और मिलकर प्रयास करने से हम मरीजों के जीवित रहने का दर बढ़ा सकते हैं और परिवारों को उम्मीद दे सकते हैं।” डॉ. मोहापात्रा ने यह भी बताया कि सभी जोखिम कारक से बचा नहीं जा सकता, लेकिन नियमित व्यायाम, डायबिटीज़ पर नियंत्रण, संतुलित आहार और धूम्रपान न करने जैसी आदतें अपनाने से पैनक्रियाटिक कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता हैं।

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